हिंडनबर्ग—2: अब भारत के सुप्रीम कोर्ट पर फ़ैसले की ज़िम्मेदारी

जिस दिन संगठित अपराध और भ्रष्टाचार रिपोर्टिंग परियोजना (ओसीसीआरपी) ने एक सप्ताह से भी कम समय पहले गौतम अडानी और भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) को एक प्रश्नावली भेजी थी, उसी दिन अभिजात वर्ग को होने वाले संभावित नुकसान को रोकने के लिए देश की सबसे प्रसिद्ध समाचार एजेंसी, प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई), ने जल्दबाजी में योजना बनाई और इसे हिंडनबर्ग-2 रिपोर्ट करार दिया, जो कि अमेरिका की शॉर्ट-सेलिंग फर्म है और जिसने इसे 24 जनवरी में, 32,000 शब्दों की रिपोर्ट का ही दूसरा स्वरूप बताया है।

इस रिपोर्ट ने शेयर बाज़ार में तहलका मचा दिया और उस कॉरपोरेट समूह पर जैसे कहर बरपा दिया था जिसका नेतृत्व तब दुनिया का तीसरा सबसे अमीर आदमी कर रहा था। ऐसा लग रहा था कि हिंडनबर्ग द्वारा शेयर की कीमतों में खुलेआम हेराफेरी का आरोप लगाने और इसके ऑपरेशन को "कॉरपोरेट इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला" बताने के बाद, अडानी समूह अब धीरे-धीरे नुकसान से उबर रहा था। लेकिन लगता है कि, आने वाले महीने अडानी और उसके कॉरपोरेट जीवन के लिए अच्छे नहीं होने वाले हैं।  

भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ पैनल ने संभावित "नियामक विफलता" के बारे में सोचा था और "न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता," "संबंधित पार्टी लेनदेन" और "लाभकारी स्वामित्व" जैसे वाक्यांशों को परिभाषित करने और संशोधित करने के तरीके पर विस्तार से बताने के लिए तकनीकी भाषा का इस्तेमाल किया था। इन शर्तों की व्याख्या कैसे की जानी चाहिए, इस पर सेबी समिति के विचारों से पूरी तरह सहमत नहीं था। वहीं, देश के वित्तीय बाजारों के नियामक ने समय मांगना जारी रखा। यह शीर्ष अदालत को बताते रहे कि जांच जटिल है और राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे है। यह तब का सच है जब हिंडरबर्ग-2 घटित हुआ था।

ओसीसीआरपी को पहले "भारत-विरोधी" कहते हुए जॉर्ज सोरोस, फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर परिवार द्वारा स्थापित ट्रस्ट सहित अन्य लोगों द्वारा वित्त पोषित संगठन के रूप में खारिज करने की मांग की गई थी। विडंबना यह है कि गौतम अडानी को पश्चिमी मीडिया ने 1930 और 1940 के दशक में अमेरिकी पूंजीवाद के "सोने के युग" के संदर्भ में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के "रॉकफेलर" के रूप में वर्णित किया था, जब अमेरिकी सरकार फोर्ड रॉकफेलर्स, लेहमैन ब्रदर्स और वेंडरबिल्ट्स जैसे बड़े उद्योगपतियों के साथ मिलकर काम करती थी।

इस बात का एहसास होना कि ओसीसीआरपी के आनंद मंगनाले, रवि नायर और एनबीआर अर्काडियो द्वारा की गई जांच को कई मीडिया संगठनों द्वारा उठाए जाने से पहले, दो प्रतिष्ठित ब्रिटिश प्रकाशनों, द गार्जियन और द फाइनेंशियल टाइम्स के साथ "विशेष" आधार पर साझा किया गया था जिससे सत्ताधारी निज़ाम से जुड़े सोशल मीडिया ट्रोल्स के साथ-साथ अडानी समर्थकों के लिए इन प्रकाशनों को सोरोस और उनके ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन का समर्थक कहना मुश्किल हो गया था। खुलासे के नए सेट के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उन कई कमियों को भरता है जिनके बारे में सेबी का दावा है कि वह उन्हें उजागर करने में सक्षम नहीं था। हिंडनबर्ग रिसर्च के नाथन एंडरसन ने कहा कि, मनी ट्रेल "लूप" को बंद कर दिया गया है।

ओसीसीआरपी जांच में विशेष रूप से ताइवान में रहने वाले चीनी नागरिक चांग चुंग-लिंग और संयुक्त अरब अमीरात के निवासी नासिर अली शाबान अली के नाम शामिल हैं, ये दोनों गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद अडानी जो साइप्रस का नागरिक है के करीबी व्यापारिक सहयोगी हैं। लीक हुए दस्तावेजों, कंपनी फाइलिंग और ई-मेल संदेशों पर आधारित ओसीसीआरपी जांच में विस्तार से बताया गया है कि कैसे ओवर-इनवॉइसिंग की कथित आय को बरमूडा और मॉरीशस जैसे टैक्स हेवेन के माध्यम से भेजा गया, फिर भारत में "राउंड-ट्रिप" किया गया और बाद में कथित तौर पर धांधली के लिए इस्तेमाल किया गया और भारतीय स्टॉक एक्सचेंजों में अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों की कीमतें बढ़ाई गई। इस प्रक्रिया में, यह आरोप लगाया गया है कि तथाकथित "संबंधित पक्षों" द्वारा किए गए लेनदेन के ज़रिए से 25 प्रतिशत के न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता मानदंड का उल्लंघन किया गया था।

सीधा सा सवाल यह उठता है कि अगर पत्रकार इतनी सारी गंदगी खोद सकते हैं तो सेबी इतने सालों से क्या कर रही थी।

नवीनतम खुलासे में वित्त मंत्रालय की खुफिया शाखा, राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) के प्रमुख का एक पत्र भी शामिल है, जिसने मोदी के प्रधानमंत्री बनने से कुछ महीने पहले जनवरी 2014 में सेबी को ओवर-इनवॉइसिंग और राउंड-ट्रिपिंग के संभावित कृत्यों के बारे में सचेत करने की कोशिश की थी। यूके सिन्हा, जो उस समय सेबी के प्रमुख थे, आज अडानी के स्वामित्व वाले एनडीटीवी के बोर्ड में निदेशक हैं। राहुल गांधी ने गुरुवार शाम को मुंबई में अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बात की ओर इशारा किया, यहां तक कि उन्होंने अडानी के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित करने की विपक्षी दलों की मांग को दोहराया है।

अब छह महीने से अधिक का समय बीत चुका है जब अडानी समूह ने न्यूयॉर्क में हिंडनबर्ग रिसर्च पर मुकदमा करने की धमकी दी थी। उसने ऐसा नहीं किया लेकिन समूह ने इसके बजाय गुजरात की राजधानी गांधीनगर के बाहरी इलाके में एक अदालत में नायर के साथ-साथ अन्य लोगों द्वारा लिखे गए लेखों पर उनके ट्वीट्स (अब एक्स) के खिलाफ मुकदमा दायर किए हैं। इस लेख के लेखक भी वर्तमान में छह मानहानि मुकदमों का सामना कर रहे हैं, जिनमें से पांच गुजरात की विभिन्न अदालतों में और एक राजस्थान में चल रहा है। समूह के वकीलों ने कुछ अन्य पत्रकारों पर भी मुकदमा दायर किया था और फिर कुछ मुक़दमे वापस ले लिए थे।

अडानी समूह का छह पैराग्राफ लंबा मीडिया बयान अपने आप में एक रक्षात्मक बयान है। यह आलोचना करते हुए कहता है कि नोट को "पूर्ण" रूप से उद्धृत नहीं किया गया और आरोपों को "पुनर्नवीनीकरण" और "सोरोस द्वारा वित्त पोषित हितों द्वारा योग्यताहीन हिंडनबर्ग रिपोर्ट को पुनर्जीवित करने के एक और प्रयास" के रूप में वर्णित किया गया है। वहीं, अडानी ग्रुप ने ओसीसीआरपी रिपोर्ट में किसी भी नए खुलासे से खास तौर पर इनकार नहीं किया है। एक बार फिर अडानी ने फिर से तिरंगे को अपने गले में लपेटने की कोशिश की है।

सीधे शब्दों में कहें तो, समूह चाहेगा कि दुनिया और उसके भाई यह विश्वास करें कि जी-20 शिखर बैठक की पूर्व संध्या पर हुए इन हमलों का उद्देश्य भारत को नीचा दिखाना है, न कि एक व्यवसायी, एक कॉरपोरेट कैप्टन के कथित दुष्कृत्यों के कारण, जिसकी निकटता प्रधानमंत्री से है और जो कोई राष्ट्रीय रहस्य नहीं रह गया है।  

पिच अब विचित्र हो गई है। आने वाले दिनों में सेबी चाहे जो भी ढूंढ पाए या न ढूंढ पाए, गेंद अब स्पष्ट रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ के पाले में है।

साभार: फ़्री प्रेस जर्नल

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