क्यों फेसबुक कंपनी को अलग-अलग हिस्सों में बांटने की मांग उठ रही है?

वैश्विक स्तर पर पिछले दो साल फेसबुक के लिए मुश्किल रहे हैं। पूरी दुनिया में फेसबुक की निगरानी बढ़ी है। कई देशों में फेसबुक को कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। 

तकनीक उद्योग के जरिए जो गड़बड़ियां की जा रही हैं, फेसबुक को उसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। फेसबुक और इसके दूसरे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर यह आरोप लग रहा है कि इनके जरिये लोगों की राय बदलने की कोशिश की जा रही है और चुनावों के नतीजे बदलने का प्रयास भी हो रहा है। साथ ही इन पर यह आरोप भी लग रहा है कि ये हिंसा भड़काने की कोशिश कर रहे हैं और खबरों को सेंसर करने का काम भी कर रहे हैं। इसके अलावा फेसबुक और इसके सहयोगी प्लेटफॉर्म पर यह आरोप भी है कि ये सब मिलकर सत्ताधारियों को और ताकत हासिल करने में मदद कर रहे हैं।

फेसबुक के अधिकारियों पर यह आरोप लग रहा है कि इन लोगों ने अपनी कारोबारी गतिविधियों और उपभोक्ताओं से संबंधित नीतियों को लेकर संप्रभु सरकार को गलत सूचनाएं दीं। इन वजहों से फेसबुक के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग और उनकी सहयोगी शेरिल सैंडबर्ग के इस्तीफे की मांग भी उठी है।

वैश्विक स्तर पर यह मांग भी उठ रही है कि बड़ी डिजिटल कंपनियों को अलग-अलग टुकड़ों में तोड़ दिया जाए। कुछ उसी तरह जिस तरह बेल समूह और एटी ऐंड टी के साथ 1980 के दशक में किया गया था। 1879 में अमेरिकन टेलीफोन ऐंड टेलीग्राफ कंपनी की स्थापना टेलीफोन का अविष्कार करने वाले ग्राहम बेल ने की थी। 1980 के दशक की शुरुआत में इस कंपनी को कई हिस्से में तोड़कर इन्हें आपस में प्रतिस्पर्धी बना दिया गया था।

सितंबर, 2018 में संयुक्त राष्ट्र संगठन ने म्यांमार में रोहिंग्या लोगों की हत्या के मामलों में फेसबुक की भूमिका को लेकर स्वतंत्र जांच का आदेश दिया। कंपनी ने यह माना कि उसे इस मामले में काफी पहले कार्रवाई करनी चाहिए थी।

दूसरे देशों के उलट भारत में फेसबुक की आलोचनाएं कम हुई हैं। इस संदर्भ में फेसबुक को भारत के सत्ताधारी दल से नजदीकी का फायदा मिला है। 

भारत में फेसबुक के एक आला अधिकारी पहले नरेंद्र मोदी की टीम में काम कर चुके हैं। ये व्यक्ति मोदी के चुनाव प्रचार टीम से 2013 में जुड़े हुए थे। इस वजह से इन पर हितों के टकराव का आरोप भी लगता है। हालांकि, फेसबुक के प्रवक्ता इसे खारिज करते हैं। 

भारत में राजनीतिक दलों के साथ फेसबुक के संबंधों के बारे में सार्वजनिक तौर पर काफी कम जानकारियां उपलब्ध हैं। जबकि अमेरिका में नवंबर, 2016 में हुए चुनावों में डोनल्ड ट्रंप की जीत और इन चुनावों में कथित तौर पर रूस के हस्तक्षेप के संदर्भ में फेसबुक की भूमिका पर काफी बात होती है। 

2012 में उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर काफी कुछ कहा-सुना गया है। उन्हें प्यार से दुनिया का पहला ‘फेसबुक राष्ट्रपति’ कहा जाता था।

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