तेल का त्रिकोण: पुतिन का तेल, अंबानी का कारोबार और ट्रंप के निशाने पर भारत

इन तीनों—डोनाल्ड ट्रंप, व्लादिमीर पुतिन और मुकेश अंबानी—में क्या समानता है? पहली नजर में शायद कुछ भी नहीं। एक अमेरिका का राष्ट्रपति है, जो अपनी अप्रत्याशित नीतियों के लिए जाना जाता है; दूसरा रूस का शक्तिशाली शासक है, जो वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पर अपनी पकड़ बनाए हुए है; और तीसरा भारत का सबसे अमीर उद्योगपति है, जिसका साम्राज्य तेल से लेकर दूरसंचार तक फैला है। लेकिन इन तीनों को एक ही धागे में पिरोने वाला एक शक्तिशाली कारक है: कच्चा तेल।

और इसी तेल के चलते बने अप्रत्याशित समीकरणों ने आज भारत को एक मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। ट्रंप प्रशासन ने भारत के कई महत्वपूर्ण निर्यातों पर 50 प्रतिशत का भारी टैरिफ लगा दिया है। यह एक ऐसा कदम है जिसने देश की अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में भूचाल ला दिया है और उन लाखों गरीबों की आजीविका पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, जो तराशे हुए हीरे, आभूषण, झींगे, समुद्री भोजन, परिधान, कालीन और इंजीनियरिंग उत्पादों से जुड़े छोटे उद्यमों, कुटीर उद्योगों और कारखानों में काम करते हैं।

इसकी शुरुआत 30 जुलाई को हुई, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर पोस्ट किया कि भारत और चीन तब रूसी ऊर्जा के सबसे बड़े खरीदार बने हुए हैं, "जब पूरी दुनिया चाहती है कि रूस यूक्रेन में हत्याएं बंद करे।" इसके बाद वाशिंगटन के शीर्ष अधिकारियों ने भारत के खिलाफ अपमानजनक और आक्रामक बयानों की झड़ी लगा दी। इतने भारी टैरिफ ब्राजील को छोड़कर किसी अन्य प्रमुख देश पर नहीं लगाए गए हैं।

अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट (जिनका पद भारत के वित्त मंत्री के बराबर है) और कट्टर व्यापार सलाहकार पीटर नवारो जैसे अधिकारियों ने ट्रंप के सुर में सुर मिलाया। नवारो ने ब्रिटेन के 'फाइनेंशियल टाइम्स' में लिखते हुए भारत पर रूस की "युद्ध मशीन" को ईंधन देने का आरोप लगाया और भारत को रूस के लिए एक "लॉन्ड्रोमैट" (अवैध धन को वैध बनाने का जरिया) तक कह डाला। उन्होंने अपने एक्स हैंडल पर दावा किया कि भारत सिर्फ "मुनाफाखोरी के लिए रूसी तेल खरीद रहा है," जिससे यूक्रेनियों की जान जा रही है और अमेरिकी नौकरियां छिन रही हैं।

अब इन तीखे बयानों से इतर तथ्यों पर नजर डालते हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल आयात करता है, जो हमारे कुल आयात बिल का लगभग एक चौथाई है। फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध से पहले, भारत का अधिकांश तेल मध्य-पूर्व (ईरान, इराक, सऊदी अरब) से आता था, क्योंकि अरब सागर पार करके तेल टैंकरों का भारत के पश्चिमी तट तक पहुँचना किफायती था। लेकिन युद्ध के बाद, जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तो रूस ने अपना तेल अंतरराष्ट्रीय दरों से लगभग आधी कीमत पर बेचना शुरू कर दिया। इस भारी छूट ने तेल को लंबी दूरी तक ले जाने के खर्चे को भी फायदे का सौदा बना दिया। नतीजा यह हुआ कि भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी जो कभी 1-2% थी, वह 2023 के मध्य तक बढ़कर 35% से 45% तक पहुंच गई।

इस रूसी तेल का लगभग आधा हिस्सा दो विशालकाय निजी रिफाइनरियों में जाता है: पहली, मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज की विश्व-प्रसिद्ध जामनगर रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स; और दूसरी, वाडिनार में स्थित रूसी स्वामित्व वाली नायरा एनर्जी की रिफाइनरी। यह दूसरी रिफाइनरी मूल रूप से एस्सार ऑयल (रुइया परिवार) की थी, जिसे बाद में रूस की सबसे बड़ी सरकारी ऊर्जा कंपनी रोसनेफ्ट और उससे जुड़ी अन्य संस्थाओं को बेच दिया गया था—एक ऐसा सौदा जिसे व्लादिमीर पुतिन और नरेंद्र मोदी दोनों का आशीर्वाद प्राप्त था। बाकी का तेल इंडियन ऑयल जैसी सरकारी कंपनियां खरीदती हैं। लेकिन विडंबना यह है कि सस्ते कच्चे तेल का कोई भी फायदा आम भारतीय उपभोक्ता तक नहीं पहुंचा; सारा मुनाफा सरकार और तेल कंपनियों की तिजोरियों में गया।

फिनलैंड स्थित संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की एक रिपोर्ट इस पूरे खेल का पर्दाफाश करती है। 22 अगस्त को अल जज़ीरा में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी ने भारी मात्रा में रूसी कच्चे तेल को रिफाइन करके विमानन ईंधन, डीजल और पेट्रोल जैसे उच्च-मूल्य वाले उत्पादों में बदला। और अनुमान लगाइए कि इन उत्पादों का सबसे बड़ा खरीदार कौन था? स्वयं अमेरिका! CREA ने उन सैकड़ों "शैडो वेसल्स" (गुमनाम जहाज) को भी ट्रैक किया, जिन्होंने प्रतिबंध लगाने वाले देशों द्वारा तय की गई "प्राइस कैप" को धता बताते हुए 60 से 80 प्रतिशत रूसी तेल का परिवहन किया।

जब अंतरराष्ट्रीय व्यापार की बात आती है, तो पाखंड की कोई सीमा नहीं होती। चीन रूसी तेल का सबसे बड़ा आयातक है, लेकिन अपनी आर्थिक ताकत के दम पर वह अमेरिका को अंगूठा दिखा सकता है। यूरोपीय संघ खुद रूस से प्राकृतिक गैस का एक प्रमुख आयातक है। अमेरिका का दोहरा मापदंड भी जगजाहिर है—वह आज भी रूस से लाखों डॉलर का यूरेनियम और अन्य दुर्लभ खनिज आयात करता है।

तो फिर यह सारा हंगामा क्यों? ट्रंप ने उस मोदी को अपमानित करने का फैसला क्यों किया, जिन्होंने हर मौके पर उन्हें गले लगाया और ह्यूस्टन में सार्वजनिक रूप से "अब की बार ट्रंप सरकार" का नारा दिया था? इसका जवाब सीधा है: ट्रंप जानते हैं कि वे मोदी को घेर सकते हैं और भारत उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। क्योंकि भारत वह 'विश्वगुरु' नहीं है जिसका दावा किया जाता है। प्रधानमंत्री मोदी अपने 11 साल के कार्यकाल में आज सबसे कमजोर और असुरक्षित नजर आ रहे हैं, और ट्रंप इसी तथ्य का पूरा फायदा उठा रहे हैं।

इस कहानी का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसकी सबसे भारी कीमत भारत के गरीबों को चुकानी पड़ेगी। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार, वी. अनंत नागेश्वरन, ने खुद स्वीकार किया है कि इस साल देश की जीडीपी में लगभग 0.5 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, यह लाखों नौकरियों के जाने और करोड़ों सपनों के टूटने का संकेत है, जो निश्चित रूप से एक बहुत बुरी खबर है।

(परंजय गुहा ठाकुरता एक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, प्रकाशक, वृत्तचित्र फिल्मों और संगीत वीडियो के निर्माता और एक शिक्षक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

This article was originally published in English in New Delhi Post:

https://newdelhipost.co.in/the-oil-triangle-how-putins-oil-put-ambani-in-trumps-line-of-fire/

 

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