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सोशल_मीडिया : क्या नरेंद्र मोदी की आलोचना से फेसबुक को डर लगता है?

भारत में कई पत्रकार और मीडिया संस्थान फेसबुक पर यह आरोप लगाते हैं कि उनकी खबरों को जानबूझकर इस प्लेटफॉर्म पर रोका जाता है। कई पत्रकारों का यह भी कहना है कि कुछ मौकों पर उन्हें अपने फेसबुक अकाउंट में लॉग इन ही नहीं करने दिया जाता। 
 

जिन पत्रकारों के साथ फेसबुक ने ऐसा किया, उन सबमें एक बात समान है। ये सभी लोग सत्ताधारी पार्टी और मोदी सरकार के विरोध में लिख रहे थे। इनमें ‘जनता का रिपोर्टर’ के रिफत जावेद, ‘जनज्वार’ की प्रेमा नेगी और अजय प्रकाश, ‘कारवां डेली’ के कई पत्रकार और ‘बोलता हिंदुस्तान’ के पत्रकार शामिल हैं।

रिफत जावेद पहले बीबीसी में काम करते थे। 27 सितंबर को फेसबुक ने उन्हें अपने खाते में लॉग इन नहीं करने दिया। उन्होंने कोलकाता से निकलने वाले अखबार दि टेलीग्राफ को बताया कि ‘जनता का रिपोर्टर’ के फेसबुक पेज को 2017 में तब प्रतिबंधित कर दिया गया जब इस वेबसाइट ने रफ़ाल लड़ाकू विमान सौदे से संबंधित विवादों की खबर प्रकाशित की।

अपने ही फेसबुक खाते में प्रवेश प्रतिबंधित किए जाने के बारे में जावेद ने दि टेलीग्राफ के फिरोज एल. विंसेंट को बताया, ‘27 सितंबर को जब मैंने सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या मसले पर आए निर्णय के बाद कुछ लिखा तो कुछ ही मिनटों के अंदर फेसबुक ने मेरा खाता निष्क्रिय कर दिया। जब मैंने नोडल अधिकारी को लिखा तब एक दिन बाद जाकर मेरा खाता फिर से चालू किया गया।’ 

कारवां डेली और जनज्वार जैसे पोर्टल के अधिकांश पाठक फेसबुक के जरिये आते हैं। इन पर इस तरह की पाबंदियों का खास असर पड़ता है। 1 अक्टूबर, 2018 को कारवां डेली की पांच खबरों को फेसबुक ने स्पैम में डाल दिया। आम बोलचाल की भाषा में समझें तो इंटरनेट जगत में किसी सामग्री को स्पैम में डालने का मतलब यह होता है कि वह किसी काम की नहीं है। 

इन पांच खबरों में से एक खबर सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा की रिहाई से संबंधित थी। उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर रिहा किया गया था। प्रेमा नेगी और अजय प्रकाश कहते हैं, ‘जब हम 4 अक्टूबर को जगे तो हमें पता चला कि हमारे दोनों निजी फेसबुक खाते कंपनी ने बंद कर दिए हैं। अपने बंद किए गए खाते को दोबारा शुरू कराने के लिए हमसे एक बार से अधिक पहचान के सबूत मांगे गए।’

बोलता हिंदुस्तान के पांच कर्मचारियों के फेसबुक खातों को भी फेसबुक ने बंद कर दिया। विंसेंट ने जब इस बारे में फेसबुक इंडिया के कम्युनिकेशन प्रमुख अमृत आहुजा की प्रतिक्रिया मांगी तो कहा गया कि 48 घंटे में जवाब भेजा जाएगा। लेकिन 8 अक्टूबर, 2018 को दि टेलीग्राफ की अपनी खबर में विंसेंट ने लिखा है कि 48 घंटे में जवाब देने की बात कहने के बावजूद फेसबुक की ओर से इस संबंध में कोई जवाब नहीं आया। इससे एक संकेत यह मिलता है कि फेसबुक कंपनी इन मामलों में कुछ छिपाने की कोशिश कर रही है।

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  • Authorship: Paranjoy Guha Thakurta, with Shinzani Jain
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